गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर
पाठ्यक्रम: GS1 / आधुनिक इतिहास
संदर्भ
- हाल ही में कवि-सम्राट गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि मनाई गई।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861–1941) के बारे में
- उनका जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता में हुआ था। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में उनकी जयंती ‘पच्चीशे बैशाख’ के रूप में मनाई जाती है।
- वे एक प्रख्यात कवि, उपन्यासकार, नाटककार, संगीतकार, दार्शनिक, चित्रकार और समाज सुधारक थे।
- उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर ब्रह्म समाज के प्रमुख नेताओं में से एक थे।
साहित्यिक योगदान
- टैगोर ने कविता के पचास से अधिक संग्रहों के साथ-साथ उपन्यास, निबंध, लघुकथाएँ और नाटक भी लिखे।
- गीतांजलि : यह भक्तिपरक कविताओं का संग्रह है और यही वह कृति है जिसने उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई।
- गोरा : यह राष्ट्रवाद, पहचान और धर्म से संबंधित प्रश्नों पर केंद्रित है।
- द होम एंड द वर्ल्ड : यह आक्रामक राष्ट्रवाद की आलोचनात्मक जाँच करता है।
- उन्होंने परंपरा को समकालीन विषयों के साथ समन्वित करके बंगाली साहित्य और संगीत को आधुनिक रूप प्रदान किया।
शिक्षा एवं सामाजिक सुधार
- उन्होंने शांतिनिकेतन में एक प्रयोगात्मक विद्यालय की स्थापना की, जो बाद में वर्ष 1921 में विश्व-भारती विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। वर्तमान में यह यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल है।
- उन्होंने मानवतावाद, रचनात्मकता, विचारों की स्वतंत्रता, प्रकृति के साथ सामंजस्य और समग्र शिक्षा का समर्थन किया।
सम्मान एवं विरासत
- उन्हें वर्ष 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। वे नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय और पहले गैर-यूरोपीय साहित्यकार बने। उन्हें यह सम्मान गीतांजलि के लिए प्रदान किया गया था।
- उन्होंने निम्नलिखित देशों के राष्ट्रगान की रचना की:
- भारत: जन गण मन
- बांग्लादेश: आमार सोनार बांग्ला
- उनका गीत ‘बांग्लार माटी बांग्लार जल’ पश्चिम बंगाल का राज्य गीत है।
- वर्ष 1915 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि प्रदान की थी, लेकिन वर्ष 1919 में जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने इस उपाधि का त्याग कर दिया।
- उन्हें गुरुदेव, कविगुरु और विश्वकवि जैसे सम्मानित संबोधनों से जाना जाता है।
स्रोत: AIR
भारत छोड़ो आंदोलन
पाठ्यक्रम: GS1 / इतिहास
समाचार में
- हाल ही में प्रधानमंत्री ने भारत छोड़ो आंदोलन के वीर प्रतिभागियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
भारत छोड़ो आंदोलन
- यह आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में 9 अगस्त 1942 को बंबई में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) के अधिवेशन के दौरान शुरू किया गया था।
- महात्मा गांधी ने राष्ट्र को ऐतिहासिक नारा ‘करो या मरो’ दिया। इस नारे ने लाखों भारतीयों को पूर्ण स्वतंत्रता (पूर्ण स्वराज) की माँग के लिए प्रेरित किया।
- कारण: इस आंदोलन का प्रमुख तात्कालिक कारण वर्ष 1942 की शुरुआत में क्रिप्स मिशन की विफलता था।
- ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के बाद भारत को ‘डोमिनियन स्टेटस’ देने का प्रस्ताव रखा, जिसे भारतीय नेताओं ने अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि भारत को तत्काल और पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए।
- इसके अतिरिक्त, द्वितीय विश्व युद्ध के कारण उत्पन्न गंभीर वस्तु-संकट और मुद्रास्फीति का दबाव तथा भारत की पूर्वी सीमाओं पर जापानी आक्रमण की बढ़ती आशंका ने ब्रिटिश शासन के प्रति व्यापक असंतोष को बढ़ा दिया।
- प्रमुख नेता: महात्मा गांधी ने अपने ऐतिहासिक आह्वान ‘करो या मरो’ के साथ आंदोलन का नेतृत्व किया।
- हालाँकि, औपनिवेशिक सरकार ने कठोर दमन का सहारा लेते हुए गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और अबुल कलाम आज़ाद सहित शीर्ष नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया।
- इसके बाद अरुणा आसफ अली, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और उषा मेहता जैसे युवा भूमिगत नेताओं ने आंदोलन को जीवित रखा। उषा मेहता ने एक गुप्त रेडियो स्टेशन का संचालन किया था।
- प्रभाव: ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों और सेंसरशिप सहित किए गए कठोर एवं हिंसक दमन के बावजूद यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त, नेतृत्व-विहीन एवं राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन में परिवर्तित हो गया।
- इसने किसानों, कारखाना श्रमिकों, महिलाओं, विद्यार्थियों और ग्रामीण समुदायों को सक्रिय रूप से ब्रिटिश शासन के विरोध में एकजुट किया तथा राष्ट्रीय एकता की भावना को गंभीर किया।
- इस आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के राजनीतिक एजेंडे को पुनर्परिभाषित किया। यह सीमित संवैधानिक सुधारों के लिए वार्ता की राजनीति से आगे बढ़कर ब्रिटिश साम्राज्य की पूर्ण और अपरिहार्य वापसी की माँग तक पहुँच गया।
स्रोत: TH
मिथिला मखाना
पाठ्यक्रम: GS3 / अर्थव्यवस्था
समाचार में
- कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने बिहार से ऑस्ट्रेलिया के लिए GI टैग प्राप्त मिथिला मखाना की प्रथम वाणिज्यिक समुद्री खेप के निर्यात को सुगम बनाया है।
मिथिला मखाना के बारे में
- मखाना, जिसे फॉक्स नट या गोरगन नट भी कहा जाता है, काँटेदार जल लिली (यूरयाले फेरोक्स) का बीज है। इसकी खेती तालाबों और आर्द्रभूमियों जैसे स्थिर स्वच्छ जल वाले निकायों में की जाती है।
- इसे कभी-कभी ‘ब्लैक डायमंड’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसका बाहरी आवरण गहरे रंग का होता है, जो प्रसंस्करण के बाद सफेद हो जाता है।
- मिथिला मखाना को वर्ष 2022 में GI टैग प्राप्त हुआ। इससे यह उत्पाद कानूनी रूप से बिहार के मिथिला क्षेत्र, मुख्यतः दरभंगा, मधुबनी और पूर्णिया, से जुड़ गया है तथा अन्य क्षेत्रों द्वारा इसी नाम से इसका विपणन किए जाने से संरक्षण प्राप्त हुआ है।
मखाना बोर्ड
- केंद्रीय बजट 2025–26 में सरकार ने बिहार में मखाना बोर्ड के साथ-साथ एक राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र स्थापित करने की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य मखाना के उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन को सुदृढ़ करना है।
- भारत के कुल मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी लगभग 85% है।
- मखाना को सरकार की एक जिला एक उत्पाद (ODOP) योजना के अंतर्गत भी शामिल किया गया है।
- यह पहल चाय बोर्ड, कॉफी बोर्ड और हाल ही में घोषित हल्दी बोर्ड जैसे क्षेत्र-विशिष्ट बोर्डों के लिए अपनाए गए मॉडल के अनुरूप है।
स्रोत: PIB
वास्तविक समय में महासागरीय आँकड़ों के पर्यवेक्षक के रूप में शार्क
पाठ्यक्रम: GS3 / विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- शोधकर्ता यह परीक्षण कर रहे हैं कि क्या शार्क को गतिशील एवं लगभग वास्तविक समय में महासागरीय आँकड़े उपलब्ध कराने वाले पर्यवेक्षकों के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
परिचय
- ऐसे सेंसरों का उपयोग किया जाना है, जो महासागरीय परिस्थितियों को मापकर समुद्र विज्ञान, वायुमंडलीय और जलवायु मॉडलों के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराएँगे।
- इन CTD टैग में छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगे होते हैं, जो समुद्री जीवों के तैरने और गोता लगाने के दौरान महासागर की विद्युत चालकता (जो लवणता से निकटता से संबंधित एक माप है), तापमान और गहराई को मापते हैं।
- पशु-आधारित सेंसरों का समुद्र विज्ञानियों द्वारा कई वर्षों से सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। विशेष रूप से ध्रुवीय क्षेत्रों में एलिफेंट सील्स पर इनका उपयोग किया जाता है, जहाँ वैज्ञानिक अवलोकन अपेक्षाकृत सीमित हैं।
- इस प्रकार के अनुसंधान में शार्क एक नई संभावना प्रस्तुत करती हैं, क्योंकि वे बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं, व्यापक रूप से वितरित हैं और कई संरक्षित समुद्री स्तनधारियों की तुलना में उन तक पहुँचना आसान है।
- पूर्व के विश्लेषणों में उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में शॉर्टफिन माको शार्क, ब्लू शार्क, स्मूथ हैमरहेड और किशोर ग्रेट व्हाइट शार्क को इस प्रकार के अनुसंधान के लिए उपयुक्त प्रजातियों के रूप में चिन्हित किया गया था।
- शार्क पर टैग लगाने की प्रक्रिया संस्थागत पशु-देखभाल निगरानी के अंतर्गत की जाती है, ताकि शार्क पर इसके प्रभाव को न्यूनतम रखा जा सके।
- इन टैगों को ऐसे पदार्थों की सहायता से लगाया जाता है, जिन्हें इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि समय के साथ वे क्षरित होकर स्वयं अलग हो जाएँ।
स्रोत: TH
भारतीय पीफॉवल
पाठ्यक्रम: GS3 / समाचार में प्रजातियाँ
समाचार में
- भारत ने जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNOG) को पाँच भारतीय पीफॉवल —चार नीले और एक सफेद—उपहार स्वरूप प्रदान किए हैं। इससे एरियाना पार्क में मोरों की उपस्थिति की एक लंबी परंपरा पुनर्जीवित हुई है।
पृष्ठभूमि
- भारत ने इससे पहले वर्ष 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान दिल्ली चिड़ियाघर से मोरों का एक प्रजनन जोड़ा जिनेवा भेजा था।
- इस प्रकार, हालिया उपहार ने भारत के राष्ट्रीय पक्षी और संयुक्त राष्ट्र जिनेवा के बीच संबंध स्थापित करने वाली 45 वर्ष पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित किया है।
- यह पहल भारत और संयुक्त राष्ट्र के बीच सहयोग, बहुपक्षवाद, जैव-विविधता संरक्षण तथा पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व को रेखांकित करती है।
भारतीय पीफॉवल (पावो क्रिस्टेटस)
- भारतीय मोर पीफॉवल कुल (फीज़ेंट परिवार) का एक बड़ा स्थलीय पक्षी है, जिसे आसानी से पहचाना जा सकता है।
- इस प्रजाति में स्पष्ट लैंगिक द्विरूपता पाई जाती है। नर (मोर) और मादा (मोरनी) को उनकी शारीरिक विशेषताओं के आधार पर आसानी से अलग पहचाना जा सकता है।
- शारीरिक विशेषताएँ:
- नर (मोर): अपने चमकीले नीले पंखों और शानदार, इंद्रधनुषी आभा वाले लंबी पूँछ के पंखों के लिए प्रसिद्ध हैं। वे मादाओं को आकर्षित करने के लिए इन पंखों को आकर्षक एवं विस्तृत ढंग से प्रदर्शित करते हैं।
- मादा (मोरनी): नर की तुलना में काफी छोटी होती हैं। इनके पंख अपेक्षाकृत फीके भूरे रंग के, पूँछ छोटी तथा गर्दन पर हल्की हरी आभा होती है। ये रंग घोंसले में अंडों को सेते समय उन्हें महत्वपूर्ण प्राकृतिक छद्मावरण प्रदान करते हैं।
- आहार एवं ध्वनि: पीफॉवल अत्यधिक मुखर पक्षी हैं और अपनी तीव्र तथा दूर तक सुनाई देने वाली ‘म्याऊँ-म्याऊँ’ जैसी आवाज के लिए प्रसिद्ध हैं। मानसून के प्रजनन काल के दौरान उनकी आवाज एवं अधिक तीव्र हो जाती है।
- ये अवसरवादी सर्वाहारी होते हैं और इनके प्राकृतिक आहार में बीज, फूल, कीट तथा छोटे सरीसृप और स्तनधारी शामिल होते हैं।
- वितरण एवं आवास: ये भारतीय उपमहाद्वीप और श्रीलंका के मूल निवासी हैं तथा खुले वन क्षेत्रों, वनों के किनारों एवं कृषि क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- भारतीय मोर का नर भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय पक्षी है और यह भारतीय सांस्कृतिक विरासत में गहराई से जुड़ा हुआ है।
संरक्षण एवं कानूनी संरक्षण
- IUCN रेड लिस्ट: व्यापक वितरण के कारण इसे ‘कम चिंतनीय ’ श्रेणी में रखा गया है।
- कानूनी संरक्षण: भारत में इसे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के अंतर्गत कठोर कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
स्रोत: IE
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संक्षिप्त समाचार 10-08-2026